देंग शेन: 9 साल में 90 देशों की यात्रा

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देंग शेन: 9 साल में 90 देशों की यात्रा

कोई भी सपना अगर पूरी शिद्दत के साथ देखा जाए तो रास्ते में आने वाली कोई भी बाधा उसे पूरा होने से नहीं रोक सकती. और अपने इसी सपने को हकीकत में बदला है चीन की 27 वर्षीय युवती देंग शेन ने. शेन ने 18 साल की उम्र में पूरी दुनिया की सैर करने का सपना देखा. सन 2006 में वो अपने इस सपने को हकीकत में बदलने के लिए निकल पड़ी. और इन 9 सालों में वो 90 देशों की यात्रा कर चुकी है.

dang shang

इस यात्रा के लिए देंग शेन के पास कोई बजट नहीं था. पर अपनी चाहत को पूरा करने में उसने बजट को बीच की बाधा नहीं बनने दिया. अपनी यात्रा के खर्चे निकालने के लिए देंग यात्रा के दौरान पार्ट टाइम जॉब भी करती रहीं. उसने पार्ट टाइम वेटर, टूर गाइड,  ट्रांसलेटर के रूप में काम किया है और अपने बिलों का भुगतान करने के लिए उसने अपनी यात्रा के अनुभवों के बारे में कहानियां भी प्रकाशित की. West China Metropolis Daily में पहली बार देंग शेन की कहानी को दिखाया गया था. देंग के कुल यात्रा का बजट अब तक 300,000 युआन (लगभग $ 46,300) पर पहुंच गया है.

यात्रा का यह जुनून देंग के मस्तिष्क में तब विकसित हुआ जब वह 18 वर्ष में अपने हाईस्कूल के दौरान पश्चिम चीन के यूनान प्रांत की सैर में गयी थी. तभी से विभिन्न संस्कृतियों की खोज और नए लोगों से मुलाकात का यह विचार देंग को जंच गया. और 2006 से उसने अपने इस विचार पर काम करना शुरू कर दिया.

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देंग ने विश्व स्तर पर अपनी यात्रा का पहला कदम 2008 में पर्यावरण इंजीनियरिंग के स्टूडेंट के रूप में जर्मनी की यात्रा से की. इससे देंग शेंग को यूरोप भर में यात्रा करने की अनुमति और अधिक आसानी से मिल गयी. चार साल बाद,  2012 में उसे स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए पेरू के एक विश्वविद्यालय में एडमिशन मिल गया. इससे उसे लेटिन अमेरिका को और करीब से जानने का मौका मिला. अपनी अंतर्राष्ट्रीय यात्रा की मेमोरी शेयर करते हुए देंग ने इसे अपने “अविस्मरणीय अनुभव” में से एक कहा है. साथ ही देंग ने साझा किया कि 2011 में उन्होंने 8000 किलोमीटर की यात्रा तय की. देंग ने अपने 90 से अधिक देशों की यात्रा के उद्देश्य को बताते हुए कहा है कि: “कोई वास्तविकता से बचने के लिए यात्रा करता है, लेकिन मैंने इन यात्राओं में अपने भीतर मेरे असल व्यक्तित्व की खोज की”.

देंग शेन के इस हौंसले और यात्रा के लिए उसके जज्बे को देखकर राहुल सांकृत्यायन की वो लाइन याद आ गयी:

“सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहाँ, जिन्दगानी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ”

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